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ये संवेदनाओं की हत्या का दौर है!

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जब तक हमारा दिल धड़कता रहता है कहां जाता है तब तक हम जिंदा हैं और जब किसी के दुख दर्द में संवेदनाएं हैं तब कर हम इंसान है। गोयकि वो दिल की धड़कन हमारी संचेतना व संवेदना का ही प्रतीक है लेकिन हम जिस दौर में जी रहे हैं वो संवेदनाओं की हत्या का दौर है। क्योंकि जब आप खुद से दूर हो जाते हैं तब किसी के पास नहीं हो सकते या कहें किसी के नहीं हो सकते। आंख बंद करके सोचेंगे तो पाएंगे की हम सच में किसी के नहीं हैं। हम जीना तो चाहते हैं पर जिंदगी असल में है क्या इसका हमें पता नहीं? हम जानना भी नहीं चाहते। बस दौडऩा चाहते हैं। बदलना चाहते हैं। कभी खुद को। कभी खुद की प्राथमिकताओं को। यही अंजाना पर हमें खुद से दूर करता है इतना कि हम इंसान हीं नहीं रहते सिर्फ मशीन होते हैं। जिसे सिर्फ काम से मतलब है। हम उसी दिन से मरने लगते हैं जब जिंदगी और रिस्तों को व्यवसाय बना देते हैं। सबकुछ स्वार्थ पर टिका होता है। जो मेरे जितना काम का वो उतना करीब। सोचिए! हम अपने मां-बाप को भी पराया करने में एक क्षण नहीं सोचते। ये अनाथालय और आøम संवेदनाओं की हत्या से ही पैदा होते हैं। सुबह से अखबार खोलते हैं तो लगता है कही...

..जिंदगी इतनी भी सस्ती नहीं कि यूं सुसाइड करके खत्म कर दी जाए!

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इन दिनों जिंदगी काफी कसमकश में गुजर रही है। किसी तरह का तनाव नहीं है फिर भी पता नहीं क्यों कुछ उलझन है, कुछ पछतावा है, कुछ बेमतलब सी परेशानियां हैं। जो नजर तो नहीं आ रही हैं लेकिन उनकी तकलीफ है बहुत। अब इस दर्द का मर्ज क्या है, ये बताना मुश्किल है. अरे इससे ज्यादा मुश्किल तो यह बताना है कि आखिर हुआ क्या है। दरअसल हमें कई बार समझ नहीं आता कि हमारी परेशानी क्या है क्योंकि हम छोटी-छोटी बातों को धीरे-धीरे दिमाग में जमा करते जाते हैं। वो सब परेशानियां होती तो छोटी हैं लेकिन जब सब एक साथ हो जाती हैं तो बहुत ही बड़ी हो जाती हैं जिनका सामना करना हमारे लिए असंभव है। बस यहीं से तनाव, अवसाद शुरू हो जाता है। फिर समझ नहीं आता कि मैं परेशान क्यों हूं क्योंकि परेशानियां इतनी हैं कि हम किसी एक पर आरोप नहीं लगा सकते। शायद इसलिए हम उन्हें दूर नहीं कर पाते और दूर चले जाते हैं अपनों से सपनों से बक्सर कलक्टर मुकेश पांडे की तरह....   हम सबको तनाव है, शारीरिक, मानसिक, व्यक्तिगत व पारिवारिक। हम मैं से अधिकतर लोग हर रोज इनसे रूबरू होते हैं। पर सब नहीं टूटते, सब यू हीं छोड़कर नहीं चले जाते। क्योंकि उन...

किस्मत पर कितना भरोसा करें? कब तक भरोसा करें? उम्मीद टूटती है तो दुख तो होता है

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हम सभी सपने देखते हैं, कुछ करने के कुछ बनने के, ये स्वाभाविक प्रक्रिया भी है। कई बार हम भरसक कोशिश करते हैं उन्हें पूरा करने के लिए बहुतों के सपनों को पंख भी लगते हैं लेकिन अधिकतर लोगों के सपने नींद टूटने की तरह ही होते हैं। जो शायद कभी पूरे नहीं होते। यहां बहुत सारी बाते कहीं जा सकती हैं कि मेहनत पूरी तरह से नहीं की गई, तन,मन का समर्पण नहीं हो पाया और भी बहुत कुछ लेकिन जब उम्मीद या सपना टूटता है न तो दुख तो होता ही है। खैर एक रामवाण इलाज है इस असफलता को पचाने का जिसे हम किस्मत कहते हैं। जब कभी हमारे साथ ऐसा कुछ होता है हम सभी सिर्फ एक ही बात करते हैं शायद किस्मत खराब थी। अगली बार देखने सफलता जरूर मिलेगी। लेकिन क्या किस्मत का पोस्टमार्टम करने पर इस बात की गारंटी मिल सकती है कि जो कमी मेरी मेहनत में रह गई थी वो किस्मत के कारण थी। उसमें मेरी गलती नहीं है। यहां यह भी कह सकते हैं क्या सच में किस्मत नाम की कोई चिडिय़ा होती है। आप कहेंगे बिल्कुल हम तो हर दिन, हर क्षण मुखातिब होते हैं ऐसे उदाहरणों से, मतलब किस्मत का अस्तित्व है तो सही लेकिन यदि वो है तो रहती कहां है। उसकी साधना का ...

"मदमस्त मौला दीवाना,,,मैंने जीवन पहचाना"

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( *जज़्बातों की बेमतलब जुगाली...बहुत जरूरी नहीं है पढ़ना.. लेकिन पढ़कर कुछ सुकून जरूर मिलेगा...लेख लम्बा है..शूरवीर ही कोशिश करें)... बार बार सोने की कोशिश कर रहा था।रात भी तो बहुत हो गई थी।पर ना जाने क्यों कुछ बेचैनियां..बेचैन किये जा रहीं थी।कुछ धुंधली सी यादें..धड़कने बढ़ा रहीं थी तो कुछ अंधूरे सपने दिल को कुरेदने में लगे थे।इतने सारे सवाल एक साथ मन में आ रहे थे की समझ नहीं पा रहा था कि आखिर जवाब दूँ भी तो किसका..एक सवाल जब तक सोने की कोशिश करता। दूसरा आकर तांडव करने लगता। लेकिन में समझ रहा था खुद को शायद..की ये जो हो रहा है वो जज़्बातों की जुगाली करने का ही परिणाम है। मेने जैसे ही पढाई को लेकर जवाब दिया। तुरंत ही करियर को लेकर आये सवाल ने हंगामा शुरू कर दिया। मैँ उसे समझा ही रहा था की।प्यार बीच में आ गया। कई सारी कसमें देने लगा।सोचा पहले उसे ही सुलझाता हूँ। पर सामने देखा तो परिवार आँखें तरेर रहा था। मैं थोडा सहम सा गया था और शायद उलझन में भी था।यहां ये कहना ठीक होगा की मैं जज़्बातों की बेमतलब जुगाली कर रहा था। फिर भी सवाल तो सामने थे ही..बस जवाब देने का धर्म संकट था। किसके ...

इरोम तुम हार ही नहीं सकती..हारी तो ईमानदारी और इंसानियत है

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जब कोई ईमानदार इंसान चुनाव में हारता है..तो वह हमारी हार होती है..प्रजातंत्र की हार होती है..इस बार मणिपुर का चुनाव भी इतिहास में याद रखा जाएगा। बीजेपी को बहुमत के लिए नहीं या कांग्रेस को झटके के लिए भी नहीं अपितु 16 सालों तक इंसानियत की लड़ाई लडऩे वाली इरोम शर्मिला के लिए। हां  90 वोट तुम्हें मिले हैं, तुम्हारी जमानत जब्त हो गई..तुमसे ज्यादा नोटा को लोगों ने पसंद किया है। लेकिन तुम हारकर भी जीत गई और हम जीतने वाले जीतकर भी हार गये। ये चुनाव तुम लड़ ही कहां रहीं थी, ईमानदारी और इंसानियत चुनाव में खड़े थे। लेकिन जब समाज से संवेदना, संचेतना, कृतज्ञता मर जाती है न तो फिर इंसानियत जीतती कहां है। वैसे भी ये भीड़ किसकी सगी होती है जिसे चाहे सिर पर बिठा लेती है..फिर चाहे वह इनका गला ही क्यों न घोंट दे। सच में जिसे जहर पसंद है..उसके लिए अमृत का आमंत्रण फिजूल है...तुम इन लोगों कि भलाई के लिए 16 साल तक भूखी रहीं..इनके लिए संघर्ष करती रही..अपनी जवानी तुमने इन लोगों के लिए समर्पित कर दी लेकिन हमने तुम्हें क्या दिया सिर्फ 90 वोट। अक्सर ऐसा ही होता है..बदलाव की बातें तो हम करते हैं लेकिन...

यकीन मानो जल्द ही ये हालात बदल जाएंगे....

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भरोसा तो रख ये हालात बदल जाएंगे, जल्द ही कुछ चेहरे साफ नजर आएंगे बात बेबात पर बातों का बतंगड़ बनाने वाले लोगों को कुछ सुनकर कुछ और ही सुनाने वाले महानुभावों को सब जानकर भी अंजान बेकसूर से दिखने वाले इन मासूमों को एक जोरदार तमाचे की तरह कुछ सख्त जवाब  भी मिल जाएंगे भरोसा तो रख जल्द ही ये हालात बदल जाएंगे....१ गलतफहमी है तुम्हारी कि तुम बिन यूं अकेले से हैं हम सब साथ नहीं है फिर भी आओ देख लो अकेले खड़े हैं हम हर सांस के लिए जंग की तरह भले ही ज²ोजहद करते जाएंगे यकीन मानो जल्द ही ये हालात बदल जाएंगे..... हर तरफ मुझ जैसे कई चोट खाए हुए ही तो दिखते हैं जख्म पर नमक लगाने वालों में से कुछ के साथ खून के भी रिस्ते हैं अब जरा दुख की घडिय़ों की हवा तो चलने तो कुछ चेहरों से अपने आप पर्दे उतर जाएंगे.. यकीन मानो बहुत जल्द ही हालात बदल जाएंगे.. अव्यक्त

चचा की जेएनयू चाय......

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ठंड खत्म होने से पहले ही उमस बढ़ाने वाली गर्मी की दोपहरी को चचा कलूराम के टपरे पर चाय पी रहे थे। चाय का पहला घूट पीते हुए ही चचा की जीभ जरा जल गई। बस फिर क्या था। चचा चालू हो गए। कलूराम तुम्हारी चाय भी ना जेएनयू की तरह हो गई है। ना जाने कितनों की जीभ जला रही है। नाम सुनते ही लोग बड़बड़ाने लगते हैं। अब तुम्हारी चाय भी चायविरोधी हो गई है। चाय के नाम पर कलंक है तुम्हारी चाय। कलूराम, पर चचा चाय तो गर्म ही होती है आपको ही सोच समझकर पीना थी ना , आप बस हो हल्ला मचाने लग गए। अच्छा मैं हो हल्ला मचा रहा हूं, मैं नासमझ हूं...मैं ना समझुं तो बुरा और सरकार ना समझे तो अच्छा। अरे सरकार भी तो समझ सकती थी ना कि , छात्र युवा हैं थोड़ी गर्मी तो होगी ही। समझा बुझाकर मना लेते इतना बवाल ही ना मचता। लेकिन नहीं कुछ विकास ना कर पाए तो बवाल तो करना ही है। बिल्कुल मेरी तरह जब पैसे ना देना हो तो चीखना चिल्लाना शुरु कर दो। और तुम भी तो पैसे ना दो तो मौहल्ले के काले कलूटे लठेतों को बुला लेते हो। जैसे सरकार ने काले कोट वालों को बच्चों को पीटने बुला लिया था। और हां तुम्हारे पड़ोसी भी तो इतनी सी बात क...